शनिवार, 17 सितंबर 2011

प्रभु की लीला

जब भी जीवन पर संकट आया है,
हर बार प्रभु ने ही मुझे बचाया है,
जीवन कड़ी धूप है लेकिन,
हर पल प्रभु की ऊपर शीतल छाया है,
राह भटक कर न  जाने  अबतक कहाँ गया होता,
सत्मार्ग सदा प्रभु ने हमें दिखाया है,
साँस साँस प्रभु का प्रसाद,
रोम रोम को प्रभु ने स्वयं बनाया है,       

मंगलवार, 9 अगस्त 2011

मुसाफिर

तनहाइयाँ और ये गम के साये,
कोई इस हाल में किस तरह मुस्कुराये,
दोस्ती आँधियों की अंधेरों से है,
आरजू का दिया कोई कैसे जलाये,
चलन है शराफत पे तोहमत का अब,
दिल में रह जाती हैं नेक दिल की सदायें,
है काँटों भरी ये राहे - हयात,
इनसे दामन मुसाफिर कैसे  बचाए,

शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

उम्मीद

मुलाकात पर ये गर्दिश के साये,
न तुम मुस्कुराये न हम मुस्कुराये,
वफ़ा का जहाँ में नहीं आसरा,
सितम कितने मुझपर जमाने ने ढाए,
हो गए गैर वो जो थे मेरे हबीब,
तख्दीर ने क्या ये मंजर दिखाए,
इस तरह से अंधेरों ने घेरा मुझे,
कोई उम्मीद अब रौशनी की न आये,
है  मजधार में सफीना मेरा,
भंवर में ये  कश्ती न यूं  डूब  जाए, 

गुरुवार, 28 जुलाई 2011

मुस्कुराते जाइए

गम हो  या ख़ुशी मुस्कुराते जाइये
गीत उल्फत का सुनाते जाइये
बिजलियों की फिक्र करना छोड़कर
आशियाने को बनाते जाइये
हर सफ़र आसान हो जाये अगर
आप दिल से दिल मिलाते जाइये
होगी जुदाई गर मिलन है
लम्हे लम्हे को सजाते जाइये

शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

हस्ती

kuch baat hai ki hasti mitti nahi hamari,
sadiyon raha hai dushman daurejahan hamara.

mita de apni hasti ko agar ba martaba chahe,
ki dana khak mein milkar guleguljar hota hai,

  होने लगगे जलसे रोज हमारे मुकाम पर, गर आप एक बार भी रख कदम यहाँ. शुया तदर का जसने िमलाया आपसे, वना कबये जदगी तनहाइय से दूर थी.

शुक्रवार, 24 जून 2011

मैं

जब से तेरी  तश्वीर दिल में उतारी है,
वीरान गुलिस्तान की किस्मत संवारी है,
बस  एक मुलाकात की हसरत लिए हुए ,
तन्हाई में हर शाम हमने गुजारी है,

शनिवार, 30 अप्रैल 2011

सद्व्यवहार

         दूसरों के लिए हम वैसा ही व्यवहार करें, जैसा हम स्वयं अपने लिए अपेक्षा करते हैं, बाहर से  देखने में सभी आदमी एक जैसे  हैं, मनुष्य की बौद्धिक एवं शारीरिक उच्चता नापने की कसौटी उसका व्यवहार ही है.
         सद्व्यवहार आकर्षण का केंद्र है तो दुर्व्यवहार विकर्षण का कारण है. शिष्टता हमारे सामाजिक जीवन का मधुर रस है तो अशिष्टता सार्वजानिक जीवन का सबसे बड़ा कलंक है.  व्यक्तिगत हो या सार्वजानिक सभी जगहों में शिष्टता एवं सद्व्यवहार की प्रशंशा होती है. प्रायः छोटी -छोटी आदतों से हमारे चरित्र की अशिष्टता प्रकट हो जाती है जिन मामूली बातों की हम उपेक्षा करते हैं उन्ही के द्वारा दूसरे हमे अशिष्ट कहते हैं.
          शिष्टता हमारी प्राथमिक आवश्यकता है. कर्म, वाणी, व्यवहार, पोशाक और सामाजिक जीवन में दूसरे की सुबिधा का ध्यान रखना हमारी शिष्टता की कसौटियां हैं. शिष्टाचार ही सफलता की कुंजी है.
          परस्पर प्रेम सद्भाव नेह और उत्तम संबंधों का मूल सद्व्यवहार ही है. मनुष्य जैसा व्यवहार करता है वैसी ही उन्नति करता है. मानव को प्रेम मय व्यवहार करना चाहिए इससे मानवता की प्रतिष्ठा बढती है. ज्ञान, बल, धन, की सार्थकता मानवोचित सद्व्यवहार पर निर्भर है. वार्तालाप से मनुष्य की उच्चता या नीचता प्रकट होती है. वार्तालाप में शुभ, मंगलकारी, शिष्ट, मधुर, कर्णप्रिय एवं संयमित शब्दों का प्रयोग करना चाहिए


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