मंगलवार, 9 अगस्त 2011

मुसाफिर

तनहाइयाँ और ये गम के साये,
कोई इस हाल में किस तरह मुस्कुराये,
दोस्ती आँधियों की अंधेरों से है,
आरजू का दिया कोई कैसे जलाये,
चलन है शराफत पे तोहमत का अब,
दिल में रह जाती हैं नेक दिल की सदायें,
है काँटों भरी ये राहे - हयात,
इनसे दामन मुसाफिर कैसे  बचाए,

शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

उम्मीद

मुलाकात पर ये गर्दिश के साये,
न तुम मुस्कुराये न हम मुस्कुराये,
वफ़ा का जहाँ में नहीं आसरा,
सितम कितने मुझपर जमाने ने ढाए,
हो गए गैर वो जो थे मेरे हबीब,
तख्दीर ने क्या ये मंजर दिखाए,
इस तरह से अंधेरों ने घेरा मुझे,
कोई उम्मीद अब रौशनी की न आये,
है  मजधार में सफीना मेरा,
भंवर में ये  कश्ती न यूं  डूब  जाए,