रविवार, 10 नवंबर 2013

टूटो तो विखर जाओ सितारों की तरह

टूटो  तो  विखर जाओ सितारों की  तरह ।
दुनिया को नज़र आओ नज़ारों  की तरह। 
हंसने का सलीक़ा काँटों के दरमियाँ ,
कलियों को तुम बताओ बहारों की  तरह। 
जितनी भी चली आयें गमे -आंधियाँ यहाँ ,
अपने कदम जमाओ दीवारों की  तरह। 
सीने सेलगाते हैं जो बेबसों को भी ,
कश्ती को नज़र आओ किनारों की तरह। 

गुरुवार, 16 मई 2013

सदा ये धरती हरी रहे

हरित पल्लवो से ये धरती,चिरपर्णी यूँ ही बनी रहे, कोटि-कोटि के बृक्षों से,सदा ये धरती हरी रहे। उषा की अभिराम छटा फैले प्रतिदिन इस धरती पर, उपवन की डाली-डाली यूँ ही कुसुमों से भरी रहे। सदा लुभाए आकर्षण, बहुवर्णी साँझ की बेला का, हर शाम हमारी धरती की नाना वर्णों से सजी रहे। चलते रहें सदा यूँ ही मादक झोंके पुरवाई के, सावन की श्याम घटावों की आकाश में चादर तनी रहे। धनी रहे यूँ ही धरती,मनभावन ऋतुवों के क्रम से, शरद,शिशिर, हेमंत, बसंत की क्रमता यूँ ही बनी रहे। ब्रह्माण्ड में मेरी बसुन्धरा, कितनी प्यारी न्यारी है, मनमोहक हरियाली इसकी, प्रतिपल नैनों में बसी रहे।

बुधवार, 27 जून 2012

अंत में मिलकर सागर में सागर की लहरें बनती हैं,

नदियाँ अपने उर में लेकर  पथ की यादें बहती  है,
अंत में मिलकर सागर में सागर की लहरें बनती हैं,
किसकी हमें प्रतीक्षा है किसलिए यहाँ दुःख सहना है,
राहें सारी इस जीवन की एक ही मंजिल पर मिलती हैं,
माया जीवन की मृगमरीचिका प्राणों को है भरमाती,
नयी-नयी अभिलाषाएं नित बनती और बिगड़ती हैं,
आतुर है कितना चंचल मन पाने को अनजानी मंजिल,
बस इसी लालसा में सांसे संघर्ष हमेशा करती हैं,

है स्थूल शरीर और है क्षणभंगुर ये जीवन,
प्रत्येक आत्मा इस जग में नित नूतन रूप बदलती हैं,
अस्तित्व है मानव जीवन का पानी के बुलबुले जैसा,
मिल जाती हैं फिर पानी में बूदें जो जीवन बनती हैं,
करने लगता है मन मयूर ये झूम-झूम कर मधुर गान,
जब भी  धरातल पर इसके  आशा की किरणें पड़ती हैं,
स्पर्श हर्ष का जब झोंका मन अंतर को करता है,
अभिलाषाएं रह-रहकर  फिर सजती और सवरती हैं,
दुर्गम पथ  के आने पर मत हत-उत्साहित हो जाना,
नतमस्तक दृढ़ निश्चय के आगे बाधाएँ रहती हैं,
जो भी होना होता है वह होकर ही रहता है,
कहाँ नियति के आगे सबकी इच्छाएं  चलती हैं,

शुक्रवार, 15 जून 2012

हम तुम्हारे हैं और तुम हमारे सदा,

वो  जबसे खेयालों  में आने लगे हैं,
बेखुदी में हम गुनगुनाने लगे हैं,
जब भी  मिलते थे खामोश रहते थे अब,
वो  मुझे देखकर मुस्कुराने लगे हैं,
एक  खूबसूरत सा वो अक्स बनके,
धीरे-धीरे से दिल में  समाने लगे हैं,
किससे है किसको  ज्यादा मुहब्बत  यहाँ,
वो हमें हम उन्हें आजमाने लगे हैं,
किनारों पर दिल के खेयाल आपके,
लहरों की तरह से आने-जाने लगे हैं,
इतना  बेचैन  मन था न  पहले कभी,
रात-दिन वो हमें याद आने लगे हैं,
हाय खामोश आखों की गहराइयाँ,
उन झीलों में हम दिल डुबाने लगे हैं,
प्यार का ये तुम्हारे नशा हल्का-हल्का,
बिन पिए अब कदम लड़खड़ाने लगे हैं,
न होना कभी हमसे नाराज तुम,
मनाने में तुमको ज़माने लगे हैं,
हम तुम्हारे हैं और तुम हमारे सदा,
सारे भौरे येही गीत गाने लगे  हैं,
 

अधरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसितं मधुरं

 
अधरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसितं मधुरं !
हृदयं मधुरं गमनं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं !!
वचनं मधुरं चरितं मधुरं वसनं मधुरं वलितं मधुरं !
चलितं मधुरं भ्रमितं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं !!
वेणुर्मधुरम रेणुर्मधुरम पानिर्मधुरम पादो मधुरो !
... नित्यम मधुरं सख्यं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं !!
गीतं मधुरं पीतं मधुरं भुक्तं मधुरं सुप्तं मधुरं !
रूपं मधुरं तिलकं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं !!
करणं मधुरं तरणं मधुरं हरनाम मधुरं सुप्तं मधुरं !
वमितं मधुरं शमितं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं !!
गुंजा मधुरं माला मधुरा यमुना मधुरा वीची मधुरा !
सलिलं मधुरं कमलं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं !!
गोपी मधुरा लीला मधुरा युक्तं मधुरं मुक्तं मधुरं !
दृष्टं मधुरं शिष्टं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं !!
गोपा मधुरा गावो मधुरा यष्टिर्मधुरा सृष्टिर्मधुरा !
दलितं मधुरं फलितं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं

मंगलवार, 12 जून 2012

आँधियों में चिरागों को जलना पड़ेगा,

सितम ये हमें कब तक  सहना पड़ेगा,
एक न एक  दिन हमको अड़ना पड़ेगा,
है  मतलब परस्ती सभी के  दिलों में,
ठोकरें खा के खुद ही संभलना पड़ेगा,
आज उल्फत का है  सामना नफरतों से,
आँधियों में चिरागों को जलना पड़ेगा,
हैं राहों में कांटे बहुत जिन्दगी के,
देखकर हर कदम हमको रखना पड़ेगा,
लाख  पर्दों में छिप जाइएगा मगर,
एक न एक दिन तो निकलना पड़ेगा,
हर   इंसा जो इंसा  का दुश्मन बना है,
ये फितरत उसे अब बदलना पड़ेगा,

भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार समाप्त हो ऐसी इच्छा जनता में नहीं है सब किसी न किसी तरह इसे फलता फूलता देखना चाहते हैं धनवान बनने की होड़ भ्रष्टाचार को ऊर्जा प्रदान करती है, दिन बा दिन हम अंपने संसाधनों को बढ़ाते जा रहे हैं इसके लिए हमें धन की जरुरत होती है जिसे हम ईमानदारी पूर्वक नहीं अर्जित कर सकते हैं,हमारी बढती जरूरतें ही हमें भ्रष्ट बनाती हैं, हम ज्ञानार्जन की अपेक्षा धनार्जन को महत्त्व दे रहे हैं, कदाचित ये... प्रवृत्ति एक दिन इस पूरेतंत्र को विफल कर देगी सभी लोग इस तंत्र को विफल करने में लगे हैं वे जिस वृक्ष की छाया में फल फूल रहे है उसकी ही जड़ों को नुकसान पंहुचा रहे हैं, एसा कुछ भी नहीं हो रहा है जिससे इस तंत्र को मजबूती और पोषण मिले. भ्रष्टाचार की समाप्ति के लिए किसी बड़े आन्दोलन और क्रांति की आवश्यकता नहीं है बल्कि आत्ममंथन की आवश्यकता है कि हम जिस रास्ते पर जा रहे हैं क्या वह उचित है क्या मात्र हमारे ही धनवान होने से सामाजिक व्यवस्था और लोकतंत्र मजबूत हो जायेगा